Uttarakhand first Pollinator Park

उत्तराखंड वन विभाग ने नया प्रयोग करते हुए कुमाऊं मंडल के सबसे बड़े शहर हल्द्वानी में देश का पहला पोलीनेटर पार्क (Uttarakhand first Pollinator Park)  तैयार किया है। पोलीनेटर श्रेणी में तितली, मधुमक्खी और चिड़िया आती हैं। क्योंकि यह तीनों परागण करते हैं। पर्यावरण संरक्षण और संवर्द्धन के लिहाज से यह बेहद अहम प्रक्रिया है।

Uttarakhand first Pollinator Park
Uttarakhand first Pollinator Park

उत्तराखंड देश का पहला पोलीनेटर पार्क हल्द्वानी में (Uttarakhand first Pollinator Park in Haldwani)

उत्तराखंड के नैनीताल जिले के हल्द्वानी शहर में चार एकड़ में फैले इस पार्क को वन अनुसंधान केंद्र ने विकसित किया है। इसमें मधुमक्खियों से लेकर पक्षियों तक की करीब 40 प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। ये पोलीनेटर पार्क (परागकण) में सहायक होती हैं। हाल ही में नैनीताल (Nainital) जिले के लिंगाधार गावं, खुर्पाताल (Khurpatal) में भारत का पहला ‘मॉस गार्डन‘ (India’s first moss garden in Nainital) तैयार किया गया है। देश के पहले मॉस गार्डन (India’s first moss garden) का उद्घाटन को प्रसिद्ध जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह (वाटर मैन ऑफ इंडिया) ने किया। जो की उत्तराखंड वन अनुसंधान केंद्र के लिये बहुत बड़ी उपलब्धि है।

पोलीनेटर पार्क बनकर तैयार हो गया है। इसका मंगलवार (29/12/2020) को उद्घाटन किया जाएगा। पार्क को तैयार करने में वन विभाग ने देश के ख्यातिप्राप्त तितली विशेषज्ञों की भी मदद ली है। यह देश का पहला पोलीनेटर पार्क (country’s first Polynator Park in Haldwani) है। इसमें 40 तरह के पोलीनेटर्स हैं।
– संजीव चतुर्वेदी, निदेशक, वन अनुसंधान केंद्र

वन अनुसंधान केंद्र के मुताबिक, देश में अभी तक कहीं भी परागकण पार्क या बगीचा आदि तैयार नहीं किया गया है। जागरूकता की कमी के कारण शायद ऐसा है। अमेरिका जैसे देश में जगह-जगह परागकण पार्क और गार्डन बनाए जा रहे हैं। वहां संसद ने इसे लेकर बाकायदा कानून भी बनाए हैं। पौधों के पनपने में परागण का विशेष महत्व होता है।

पोलीनेटर पार्क क्या होता है ? (What is Pollinator Park?)

मधुमक्खी, तितली और चिडिय़ा परागण कर जंगल को बढ़ाने का काम करती है। उदाहरण के तौर पर जब चिडिय़ा, तितली या मधुमक्खी नर पुष्प पर बैठते हैं तो उस दौरान पुष्प के पराग कण उससे चिपक जाते हैं। वहीं जब मादा पुष्प पर इनके द्वारा यह प्रक्रिया की जाती है तो पराग कण उस पुष्प पर गिर जाते हैं। इस प्रक्रिया को परागण कहा जाता है। जिससे नए पौधों को पनपने का अवसर मिलता है। पोलीनेटर पार्क में गेंदा, गुलाब, हरसिंगार, पारिजात समेत अन्य प्रजातियों के फूल लगाए गए हैं।

country's first Polynator Park in Haldwani
country’s first Polynator Park in Haldwani

पौधों में पराग कण (पोलन ग्रेंस) का नर भाग परागकोष यानी एनथर से मादा यानी वर्तिक्राग पर स्थानातंरण परागण (पोलीनेशन) कहलाता है। परागण के उपरांत निषेचन की क्रिया होती है। इससे प्रजनन की प्रक्रिया बढ़ती है।

देश का पहला पोलीनेटर पार्क (Country’s first Pollinator Park)

  • देश का पहला पोलीनेटर पार्क वन अनुसंधान केंद्र ने हल्द्वानी में चार एकड़ में बनाया है।
  • इसमें तितली, मधुमक्ख्यिों और चिड़ियों के 40 से ज्यादा प्रजातियां संरक्षित की गई हैं।
  • यहाँ उत्तराखंड के नैनीताल (Nainital) जिले के हल्द्वानी शहर में स्थित है।
  • इस पार्क को वन अनुसंधान केंद्र ने विकसित किया है। वन अनुसंधान संस्थान भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद का एक संस्थान है और भारत में वानिकी अनुसंधान के क्षेत्र में एक प्रमुख संस्थान है।

हल्द्वानी के पोलीनेटर पार्क (Pollinator Park) में पूरा वातावरण बनाया गया है, जिसमें मधुमक्खियां, तितलियां, छोटे कीड़े, पौधे, पक्षी आदि परागकणों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाकर वानस्पतिक संतुलन बनाए रखते हैं। इसके लिए पार्क में जगह-जगह जल कुंड बनाए गए हैं। चिड़ियाओं के घोंसले रखे गए हैं। जामुन, नीम और सेमल प्रजाति के पेड़ लगाए गए हैं और इसके साथ ही इनसे संबंधित जानकारी डिसप्ले बोर्ड व अन्य कलाकृतियों के माध्यम से दी गई हैं।

वन अनुसंधान केंद्र को देसी प्रजाति की मधुमक्खियों को तलाशने में सबसे अधिक मेहनत करनी पड़ी। वन अधिकारियों के मुताबिक, प्रदेश ही नहीं बल्कि देश में यूरोपियन प्रजाति की मधुमक्खियों का पालन बढ़ता चला जा रहा है। इस वजह से देसी प्रजातियों की मधुमक्खियों पर संकट है। अधिकारियों को बड़ी मुश्किल से कुमाऊं की गरुड़ घाटी में एक व्यक्ति के पास से देसी प्रजाति की मधुमक्खियां मिलीं।

वन अनुसंधान केंद्र के अधिकारियों के मुताबिक, करीब 95 प्रतिशत फूल वाले पौधे को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए तितली, मधुमक्खी आदि अन्य पोलीनेटर्स की जरूरत होती है। इस तरह से पोलीनेटर न हों और मिट्टी पोषक तत्वों से भरपूर हो, तो भी 1.08 लाख किस्म के पौधे अपना अस्तित्व नहीं बचा पाएंगे।

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