Dehradun

Captain Frederick Young Founder of Mussoorie Hill

कैप्टन फ्रैडरिक यंग (Captain Frederick Young) द्वारा बसाये गए सूबसूरत हिल स्टेशन मसूरी (Mussoorie Hill Station) सैलानियों को रोमांचित कर सकता है, क्योंकि देश के अन्य हिस्सों से पहले सूरज, यहां की ऊँचे ऊँचे चोटियों पर अपने आकर्षक किरणों की छटा बिखेरता है। और भले ही आलू यहां के स्थानीय निवासियों के लिए एक मुख्य भोजन हो सकता है, लेकिन उस आदमी के बारे में बहुत कम लोग ही जानकारी रखते है जिन्होंने एक हिल स्टेशन की स्थापना करते करते इस क्षेत्र में सबसे पहले आलू की खेती को किया है और आज यह पूरे पहाड़ी गावं का मुख्य भोजन में सम्मलित है।

Mussoorie Mall Road
Mussoorie Mall Road

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में मसूरी (Mussoorie) को विश्व के सात प्रमुख शहरों में जाना जाता था। यहां वे सारी सुविधाएं मौजूद थीं, जो उस जमाने में इंग्लैंड में हुआ करती थीं। अगर यह सब संभव हो पाया था तो कैप्टन फ्रैडरिक यंग की वदौलत से। वह मसूरी आए तो थे अंग्रेजी सैना के अफसर बनकर, लेकिन यह जगह उन्हें इस कदर रास आई कि फिर पूरे 40 साल यहीं रहकर इसे संवारने में जुटे रहे। यह कहानी 1815 की है, जब एंग्लो-गोरखा युद्ध जीतने के बाद देहरादून और उसके पड़ोसी क्षेत्रों पर नियंत्रण पाने के लिए सुगौली संधि (ब्रिटिश- नेपाली युद्ध को खत्म करने के लिए 1816 में, ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल की गोरखा राजशाही के बीच संधि) पर हस्ताक्षर किए गए थे। देहरादून में तैनात कई ब्रिटिश सैनिकों में आयरलैंड के युवा कैप्टन फ्रेडरिक यंग थे, जिन्होंने इसकी स्थापना के वर्षों में पहली गोरखा बटालियन की कमान संभाली थी। कैप्टन यंग – जो एक 18 वर्षीय युवा सैनिक के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी में शामिल हो गए और 44 वर्ष की सेवा के बाद जनरल के रूप में सेवानिवृत्त हुए को मसूरी का संस्थापक कहा जाता है।

कैप्टन फ़ैडरिक यंग के मसूरी के विकास में योगदान (Captain Frederick Young’s contribution to the development of Mussoorie)

Captain Frederick Young Founder of Mussoorie Hill
Captain Frederick Young Founder of Mussoorie Hill

कैप्टन फ्रैडरिक यंग (Captain Frederick Young) का जन्म आयरलैंड के डोनेगल प्रांत में 30 नवंबर 1786 को हुआ था। 18 वर्ष की उम्र में वे ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर भारत आ गए। यहाँ उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में अहम भूमिका निभाई और कई भारतीय रियासतों को जीतने के साथ ही दक्षिण भारत में टीपू सुल्तान से युद्ध कर उन्हें भी पराजित किया। वर्ष 1814 मैं कैप्टन यंग का स्थानांतरण देहरादून कर दिया गया। तब यहां टिहरी रियासत और गोरखा सेना के बीच युद्ध चल रहा था। इसके लिए टिहरी नरेश ने अंग्रेजी सैना की मदद मांगी। लगभग ढेढ़ माह चले इस युद्ध के पहले चरण में अंग्रेजी सेना के कई अधिकारी मारे गए, जिनमें मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी भी शामिल थे। कैप्टन फ्रैडरिक यंग तब उनके सहायक हुआ करते थे। जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी की मौत के बाद उन्होंने सेना की कमान संभाली। उनके नेतृत्व में सहारनपुर, लुधियाना, गोरखपुर आदि स्थानों से सेना बुलाकर दोबारा खलंगा के अभेद्य किले पर आक्रमण किया गया। तब तोप से 18 पाउंड के गोले दागे गए, जिससे किला ध्वस्त हो गया। युद्ध का समापन गोरखा सेना की हार के साथ 30 नवंबर 1814 को हुआ। गोरखाओं के यहां से हिमाचल जाने पर एक संधि के तहत टिहरी महाराज ने राज्य का आधा हिस्सा अंग्रेजों को दे दिया। यह हिस्सा ब्रिटिश गढ़वाल कहलाया।

हिमाचल में खड़ी की सिरमौर रेजीमेंट (Sirmour regiment of standing in Himachal)

इस युद्ध के बाद कैप्टन फ्रैडरिक यंग (Captain Frederick Young) ने हिमाचल प्रदेश में भी गोरखा सेना से लोहा लिया। उन्होंने देखा की गोरखा सेना साहसी व वीर हैं, सो हुकूमत के सहयोग से पहले उन्होंने सिरमौर रेजीमेंट का गठन किया। और फिर गोरखाओं को अपना बनाकर उनकी रेजीमेंट खड़ी की। कालांतर में इस रेजीमेंट के सहयोग से अंग्रेजों ने देशभर की कई रियासतों पर अपना अधिकार जमाया।

यंग ने शुरू की थी आलू व चाय की खेती (Young started potato and tea farming)

मसूरी में आलू और चाय की खेती भी कैप्टन फ़ैडरिक यंग (Captain Frederick Young) की ही देन है। बताते हैं कि वर्ष 1827 से पूर्व गढ़वाल – कुमाऊं मेँ कहीं भी आलू नहीं होता था| तब आलू सिर्फ यंग के वतन आयरलैंड में ही उगाया जाता था। मसूरी के मलिंगार में जहां कैप्टन वंग ने अपनी झोपड़ी बनाई थी, वहीं आंगन के आगे आलू के खेत भी बनाए। इसके बाद तो पूरे उत्तराखंड में जगह-जगह आलू के खेती होने लगी

मसूरी की सुंदरता पर रीझ गए थे कैप्टन यंग (Captain Young was fascinated by the beauty of Mussoorie)

कैप्टन फ़ैडरिक यंग (Captain Frederick Young) के सेना में जनरल बनने के वाद वर्ष 1823 में कैप्टन यंग ने मसूरी (Mussoorie) को वसाने का कार्य शुरू किया। तब अंग्रेज मसूरी के जंगलों में शिकार खेलने आया करते थे। कैप्टन यंग को यह जगह हर दृष्टि से आयरलैंड की तरह ही लगी। यहां की खूबसूरती और जलवायु ने उन्हें मंत्रमुग्द कर दिया । इसलिए उन्होंने ने मसूरी में डेरा डालने की ठान ली। सबसे पहले उन्होंने मसूरी (Mussoorie) के मलिंगार में शूटिंग रैंज बनाई और व 1825 में अपने लिए झोपड़ीनुमा कच्चा मकान भी बना लिया। उन्होंने अंग्रेजी अधिकारियों को मनाया कि यहां सैनिकों के लिए एक सेनिटोरियम बना लिया जाए। वर्ष 1827 में यह सेनिटोरियम बनकर तैयार हुआ और फिर अंग्रेजों ने यहां बसना शुरू कर दिया। मसूरी नगर पालिका के गठन में भी कैप्टन यंग का अहम योगदान रहा।

“मसूरी सिस्टर बाजार” भी यंग की ही देन (” Mussoorie Sister market” is also a way of giving)

Mussoorie Landour Bakehouse
Mussoorie Landour Bakehouse

कैप्टन फ्रैडरिक यंग (Captain Frederick Young) मसूरी (Mussoorie) की ऊंची पहाड़ी (अब लंदौर कैंट) पर सैनिकों के लिए वैरक और अस्पताल बनाना चाहते थे। इसके लिए पहले उन्होंने ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से विचार-विमर्श कर उन्हें विश्वास में लिया और फिर अस्पताल बनाने का कार्य शुरू किया । इस अस्पताल को ब्रिटिश मिलिट्री अस्पताल नाम दिया गया। यहां मुख्य रूप से युद्ध में घायल अंग्रेजी फौज के जवानों का इलाज होता था। इसके साथ ही घायलों का उपचार एवं देख-रेख करने वाली नर्स व सिस्टरों के लिए यहां आवासीय भी परिसर बनाए गए थे । इसीलिए कालांतर में इस बाजार को ‘सिस्टर बाजार’ नाम से जाना जाने लगा।

यंग के मनाने पर अफसरों ने नहीं छोड़ी मसूरी

कैप्टन फ्रैडरिक यंग (Captain Frederick Young) को मसूरी (Mussoorie) को बसाने का श्रय इसलिए भी जाता है, क्योंकि उन्हीं के मनाने पर अंग्रेज उच्चाधिकारी मसूरी में ही रहने के लिए तैयार हुए थे। दरअसल, अंग्रेजी फौज के उच्चाधिकारी विलियम बेंटिक ने मसूरी को ब्रिटिश प्रशासन के अनुकूल न होने की बात कहते हुए इस स्थान को निर्णय ले लिया था । ऐसे में कैप्टन यंग ने उन्हें भरोसा दिलाते हुए न केवल मसूरी को एक शानदार हिल स्टेशन व सैनिक डिपो के रूप में विकसित करने की जिम्मेदारी ली, बल्कि उसे पूरा करके भी दिखाया।

राजपुर गांव में था यंग का “डोनेगल हाउस” (Tha Young’s “Donegal House” in Rajpur village)

कैप्टन फ्रैडरिक यंग (Captain Frederick Young) मसूरी (Mussoorie) में लगभग 40 साल तक रहे। बाद में वे देहरादून के सुपरिटेंडेंट भी बने। देहरादून के पास राजपुरगांव (अब अक्सर राजपुर रोड या राजपुर के नाम से जाना जाता है) में ‘डोनेगल हाउस’ नाम से उनका शानदार आवास हुआ करता था। हालांकि, वर्तमान में वह अब मौजूद नहीं है। राजपुर शहंशाही आश्रम के मध्य से होकर आज भी जो मार्ग झड़ीपानी होते हुए मसूरी को जोड़ता है, उसे कैप्टन यंग ने ही बनवाया था। मसूरी में भारी- भरकम वाटर पंप, विद्युत गृह और तमाम भवनों के लिए तब निर्माण सामग्री राजपुर-झड़ीपानी मार्ग से ही मसूरी (Mussoorie) व लंढौर कैंट तक पहुंचाई गई थी।

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